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ISSN: ISSN: 2349-2015 Impact Factor: 5.8 | Double-Blind Peer Reviewed | Open Access
Volume-12, Issue-2 (July-December) 2025 Pages: 369-376 Open Access DOI: https://doi.org/10.5281/zenodo.19724086

बिहार में दलित परिवारों में बाल श्रम पर जाति और लिंग के संयुक्त प्रभाव के संदर्भ में दोहरे वंचन का समाजशास्त्रीय अध्ययन

संजय कुमार झा
India

Abstract

सारांश
बिहार में बाल श्रम को केवल आय-अभाव या अभिभावक-निर्णय का सीधा परिणाम मानना समस्या की सामाजिक संरचना को अधूरा समझना है। यह शोध-पत्र तर्क देता है कि दलित परिवारों में बाल श्रम एक “दोहरे वंचन” की प्रक्रिया बनकर उभरता है, जहाँ जाति और लिंग के संयुक्त प्रभाव बच्चों के जीवन-अवसरों को व्यवस्थित रूप से सीमित करते हैं। संसाधन-घाटा, सामाजिक बहिष्करण, सार्वजनिक सेवाओं तक असमान पहुँच, विद्यालयी अनुभवों में असुरक्षा या भेदभाव, तथा असंगठित श्रम-बाजार की पदानुक्रमित प्रकृति, ये सभी कारक एक साथ काम करके बच्चों को श्रम के विविध रूपों में बाँध देते हैं। इस संयुक्तता का एक प्रमुख परिणाम यह है कि दलित लड़कियों पर घरेलू और देखभाल-कार्य का समय-भार अपेक्षाकृत अधिक पड़ता है, जिससे उनकी पढ़ाई, उपस्थिति और सीखने की निरंतरता धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है। दूसरी ओर, दलित लड़के अपेक्षाकृत अधिक दृश्य मजदूरी या बाजार-आधारित छोटे कामों में दिखाई दे सकते हैं, जहाँ कम उम्र में कमाई को परिवार के संकट-प्रबंधन का साधन समझा जाता है। दोनों ही मार्ग बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और गरिमा के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। यह पेपर द्वितीयक स्रोतों के आधार पर बिहार के लिए अवधारणात्मक ढाँचा विकसित करता है, संकेतक-आधारित साक्ष्यों से समस्या की दिशा स्पष्ट करता है, और नीतिगत निहितार्थ प्रस्तुत करता है। निष्कर्षतः, जाति-लिंग की संयुक्तता को केंद्र में लाए बिना बाल श्रम उन्मूलन की रणनीतियाँ सतही रह जाती हैं और उनका प्रभाव सीमित होता है।

कुंजी शब्द: दोहरे वंचन, जाति-लिंग संयुक्त प्रभाव, दलित, बाल श्रम, समय-गरीबी, घरेलू श्रम, विद्यालयी भेदभाव, बिहार, सामाजिक बहिष्करण