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ISSN: ISSN: 2349-2015 Impact Factor: 5.8 | Double-Blind Peer Reviewed | Open Access
Volume-12, Issue-2 (July-December) 2025 Pages: 377-386 Open Access DOI: https://doi.org/10.5281/zenodo.19724184

नशाखोरी और किशोर रोग-व्यवहार के समाजशास्त्रीय आयाम

शिवानी कुमारी
India

Abstract

सार
किशोरावस्था में नशाखोरी और रोग-व्यवहार का संबंध केवल जैविक या मनोवैज्ञानिक स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक संरचनाओं, सांस्कृतिक मान्यताओं, परिवार-व्यवस्था, सहपाठी-समूह, शहरी-उपभोक्तावाद, मीडिया-प्रेरणाओं, विद्यालय-प्रतिस्पर्धा, और नीति-नियमन के जटिल अंतर्संबंधों में निर्मित होता है। भारत में तंबाकू, अल्कोहल और अन्य मन:प्रभावी पदार्थों का आरम्भ अक्सर किशोरावस्था के आसपास दिखाई देता है, जबकि उसी चरण में नींद-विघटन, सिरदर्द, पेटदर्द, चिड़चिड़ापन, तनाव-लक्षण, भोजन-व्यवहार का असंतुलन, और अध्ययन-अनुशासन में गिरावट जैसे रोग-व्यवहार उभरते हैं। यह शोधपत्र उपलब्ध राष्ट्रीय सर्वेक्षण-आधारित प्रमाणों और सहकर्मी-समीक्षित साहित्य के आधार पर यह स्पष्ट करता है कि नशाखोरी एक “व्यक्ति-केन्द्रित दोष” नहीं, बल्कि अवसर-ढाँचे, सामाजिक अनुकरण, और असमानताओं से संचालित सामाजिक प्रक्रिया है। अध्ययन का तर्क है कि किशोर रोग-व्यवहार कई बार नशाखोरी का परिणाम होता है, पर अनेक स्थितियों में वही रोग-व्यवहार नशाखोरी का पूर्व-संकेत और प्रेरक बनकर “स्व-उपचार” जैसी प्रवृत्ति को बढ़ाता है। निष्कर्षतः, रोकथाम के लिए केवल दंड-आधारित नियंत्रण अपर्याप्त है; विद्यालय-समुदाय-परिवार के संयुक्त मंच, मानसिक-स्वास्थ्य साक्षरता, जीवन-कौशल, और समय पर परामर्श-सुविधाओं सहित बहु-स्तरीय ढाँचा अधिक प्रभावी दिशा देता है।

कूट शब्द: नशाखोरी, किशोरावस्था, किशोर रोग-व्यवहार, पदार्थ-उपयोग, तंबाकू-उपयोग, अल्कोहल-उपयोग, सहपाठी-समूह, समूह-दबाव, विद्यालय-संस्कृति, कोचिंग-संस्कृति, शैक्षिक-तनाव, नींद-विघटन